Tuesday, November 3, 2009

ये कैसी नादानी

सारे काम पड़े अधूरे

चलने की तैयारी

जीवन की नैया कब डगमग हो

ये किसने जानी

फ़िर कैसी इंतजारी?

जो करना है

वो कर गुजरो

नींद छोड़कर रण में उतरो

अरमानो की आग तेज हो

लक्ष्य सामने खड़ा बेध दो

कल नही

ये काम आज हो

क्यों आलस भरी लाचारी ?

घिरा हुआ क्यों बैठा घर मे

ये कैसी नादानी

जज्बातों के पंख उगे हों

सुन्दर सपने आँख भरे हों

पग में तेरे वेग भरा हो

मन बुद्धि का योग बना हो

फ़िर क्यों करता देरी?

गाँव-गाँव और गली-गली में

मोत लगाती फेरी

Saturday, September 12, 2009

मिलन

प्रात: बीता

गई दोपहरी

आई शाम की बेला

कुछ दूरी पर

खड़ा अँधेरा

चला-चली का मेला

राहें लम्बी

राही अकेला

पार घनो के जाना

पंचतत्व से बना शरीर

धरती पर रह जाना

हंस उडेगा अपनी गति से

पार गगन के जाना

जिसका अंश

उसी से मिलकर

होगा एकाकारा

वह भी मेरी आँखे तकता

मुझको भी इतज़ार उसी का

वर्षों बाद मिलन जब होगा

जाने कैसा अवसर होगा.

Sunday, June 7, 2009

प्रिय मित्रों

मैअपनी भावनाओ तथा अपने विचारों को लेखों एवं काव्य के माध्यम से आप सबके बीच प्रस्तुत करना चाहता हूँ। इसलिए मेने शंखनाद ब्लॉग आरम्भ कियाहै। आप के सहयोग का अभिलाषी हूँ।